हिन्दी साहित्य में किसानः सपने, संघर्ष, चुनौतियाँ और 21 वीं सदी, मीडिया, बाजार, विज्ञापन और फिल्मी दुनिया समाचार के आइने में युवा भारतीय किसान

 

Dr. (Smt.) Vrinda Sengupta1, Dr. Ambika Prasad Verma2

1Asstt. Professor (Sociology), Govt T.C.L.P.G. College, Janjgir

2Asstt. Professor (Political Science), Govt T.C.L.P.G. College, Janjgir

 

साराँश

धरती और किसान का अटूट रिश्ता है, वह अपनी जमीन से सर्वाधिक लगाव रखता। वही उसका सब कुछ है। दरअसल कृषक समाजों के लिए कृषि कोई धंधा नहीं बल्कि उनकी जीवन शैली है। किसान के लिए खेती कोई व्यापार-व्यवसाय भी नहीं हैबल्कि यह तो उसकी रोजमर्रा की जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा है,ै किसान अपने खेतों से सर्वाधिक लगाव रखता है और वह किसी भी कीमत पर अपने खेत छोड़ने को तैयार नहीं होता। लाख प्रलोभन भी उसे नहीं डिगा पाते, किसान के लिए उसका खेत ही सब कुछ होता हैसब कुछ खोकर भी वह ‘‘किसान’’ बना रहना चाहता है। वह दो बीघे की जायदाद का मालिक कहलाना ज्यादा पसंद करता है और जब-जब उसकी इस धरोहर को छीनने की कोशिश की गई है, तब-तब उसने उग्र रुप धारण किया है और आंदोलन के रास्ते पर उठ खड़ा हुआ है। प्रमाण स्वरुप अंगे्रजों के विरुद्ध हुए किसानों के आंदोलन देखे जा सकते है।

 

हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं किसान जीवन की विधिक छवियों का प्रमाणिक अंकन समय-समय पर हुआ है। पे्रमचंद ने अपने रचनाओं माध्यम से किसान को साहित्य में एक मुकम्मल जगह प्रदान की। उन्होनंे किसान जीवन को बहुत करीब से देखा और फिर उसकोे अपने लेखन का केन्द्र बनाया। प्रेमचंद के प्श्चात् ग्रामीण जीवन पर बहुत लेखकों ने उपन्यास और कहानियां  लिखी जो उल्लेखनीय रही है। साथ ही हिन्दी कविता में भी किसान जीवन की विविध छवियां अंकित है। लेकिन इधर के वर्षो में परिस्थितियां बदली है। 21वीं सदी की विभिन्न चुनौतियों ने किसानांे के समक्ष बहुत सारे सवाल खड़ेे कर दिए। वैश्वीकरण और भू-मण्डलीयकरण के प्रभाव ने अन्नदाताओं को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया। बढ़ते पूंजीवादी प्रभाव ने किसान जीवन को हाशिए पर धकेल दिया है। लेखन की दुनिया में भी आज किसान धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। ऐसे भीषण समय में पे्रमचंद आज भी हमारे लिए प्रासंगिक और समकालीन है क्योंकि न किसानों और जमीन की समस्या हल हुई है न भूमिहीन मजदूरों को श्रम शोषण से मुक्ति मिली है, बल्कि उसमें स्त्रियों, दलितों, आदिवासियों और अल्प संख्यकों के नये आयाम और जुड़ गए। पे्रमचंद की संवेदना, सरोकार और दृष्टि ही उनकी परम्परा है।

 

 

 

जिसे हम आज जल, जमीन और जंगल के असमान वितरण के संघर्ष के रुप में देख रहे है।

 

शब्द कूंजीः औद्योगीकरण मीडिया, विज्ञापन, बाजार, समाचार-पत्र।

 

प्रस्तावना

बढ़ता औद्योगीकरण आज खेती किसानी को निगलनेे के लिए तैयार है। किसानों की जमीनें उद्योगों के नाम पर जबरदस्ती  सरकार द्वारा अधिग्रहित की जा रही है। किसानों की भूमि उद्योगपतियों को कौड़ियों के दाम पर दी जा रही है, कर्ज से दबकर किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे है।  खाद-बीज, कीटनाशकों पर निर्भरता और तकनीकी एकाधिकार के फाॅस में किसान को गुलाम बनाने का कुचक्र लगातार जारी है। बीज पर बड़े-बड़े पूजीपतियों का एकाधिकार हो चुका है। परम्परागत बीज उजाड़ दियें गए है। हाईब्रीड बीज बेचने वाले ही उसे बनाने वाले है। अब किसान फसलों से बीज नहीं तैयार कर सकते, पूॅजीपतियों द्वारा तैयार बीजों के लिए अत्यधिक कीटनाशक, पानी और रासायनिक खाद चाहिए, ऐसे में अन्नदाता दूसरों की मर्जी पर खेती किसानी को विवश है। यह एक क्रुर समय है, जहां किसान को लगातर हाशिए पर धकेलनें की कोशिशें जारी है। साहित्य, कला फिल्म सब जगह से उनकी उपस्थिति लगभग गायब होती जा रही हैं ऐसे में किसानों पर बात करना और भी समीचीन हो जाता है।

 

युवा शक्ति किसी भी देश या प्रदेश की सबसे अनमोल पूंजी होती है युवाओं में जोश एवं उत्साह का भण्डार रहता है। युवाशक्ति का बेहतर उपयोग कर ही कोई भी प्रदेश व देश प्रगति के शिखरों को छू  सकता है।

 

महत्व

सड़क, बिजली, पानी, चिकित्सा जैसी विभिन्न सुविघाओं पर या अघोसंरचना के विकास पर किया जाने वाला निवेश बहुत जरुरी है। लेकिन प्रदेश की अगली पीढ़ी के निर्माण पर समुचित निवेश उससे भी ज्यादा जरुरी है। युवा ही किसी परिवार या समाज, प्रदेश या देश के सुखद भविष्य की बुनियाद होते हैं। युवावस्था की सही देखभाल उन्हें व्यक्तित्व विकास की सही शिक्षा-दीक्षा उनके स्वालंबन की उचित योजनाएं बनाकर उनकी ऊर्जा का उपयोग सही दिशा में कर सकते हैं।

 

उद्देश्य

(1) समाज, राजनीतिक और समाजिक हित में किसानों कही उपेक्षा, उपस्थिति और दुर्दशा पर बहस कर उन्हें केन्द्र में स्थापित करने की कोशिश करना।

(2) सर्व प्रथम मीडिया का उद्देश्य जन जागरण हो।

(3) आज के प्रतियोगी समाज में युवाओं के लिए कारगर सिद्ध हों।

(4) रोजगार संबंधी एवं समाजिक कुरीतियों संबंधी जानकारियां देना आवश्यक हो।

(5) शासन संबंधी नकारात्मक क्रियाकलापों को लोगों के सामने लाना।

 

उपकल्पना

(1) मीडिया हमारे जीवन में सकारात्मक सोच लाये व अपनी सार्थकता सिद्ध करें।

(2) आज की युवा वर्ग की सोच को सबके सामने लाये।

(3) सरकार के क्रियाकलापों की जानकारियां हम तक पहुॅचायें।

(4) आज भी हम पर हावी सामाजिक कुरीतियों को हटाने में हमारी मदद करें।

 

अध्ययन पद्धति

प्रस्तुत अध्ययन हेतु द्धैतीयक आंकड़ों का संकलन किया गया है।

 

संचार के कार्य

(1) जब हमें किसी को कोई जानकारी, सूचना देनी हो या हमें किसी से कोई जानकारी लेनी हो (जैसे- टी. वी. पर बातचीत करना, समाचार सुनना या देखना आदि)।

(2) जब हमें विचारों या भावों, मतों, अवधारणाओं को दूसरों तक पहुॅचाना हो।

(3) जब हमें मनोरंजन करना हो (जैसे - फिल्म देखना, संगीत सुूनना, रेडियो सुनना आदि)।

(4) जब हमें अपनी भावनाओं, विचारों को दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध करना हों।

(5) जब हमें किसी को अपने विश्वास में लेना हो।

(6) जब हमें किसी से प्यार करना हो, घृणा करनी हो, किसी को समझाना हो या किसी पर क्रोध करना हो।

(7) जब हमे अपनी भावनाओं को ध्वनियों, शब्दों, चित्रों और संकंेतों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक पहुॅचाना हो।

 

संचार के बिना हमारे जीवन और समाज की कल्पना तक नहीं की जा सकती। हमारी गति-प्रगति का मूल आधार ही संचार है। संचार ने हमारे जीवन को बहुत ही सुविधाजनक और तेज बना दिया है। दुनिया ने हमें जहां परिवर्तन दिखाई देता है उस परिवर्तन का कारण संचार ही है।

 

जनसंपर्क के विविध माध्यमः-

(1) दूरदर्शन (ज्ण्टण्), (2) रेडिया (त्ंकपवण्), (3) फिल्में (थ्पसउ), (4) प्रकाशन विभाग (च्नइसपबंजपवद क्पअपेपवद),

(5) क्षेत्रीय प्रचार निदेशालय (त्महपवदंस च्नइसपबपजल क्पतमबजवतलण्), (6) विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (क्ण्।ण्टण्च्ण्), (7) प्रेस अनुभाग (च्तमेे ठनतमंन),

(8) संगीत व नाटक, गीत अनुभाग (डनेपब ंदक क्तंउं क्मचंतजउमदजण्),

(9) फोटो प्र्रभाग (च्ीवजव क्पअपेपवद),

 

समाचार-पत्र

सुबह बिस्तर छोड़ते ही आज का नागरिक एक कप चाय और समाचार पत्र. की मांग करता है। वह चाय की चुस्की लेकर शारीरिक स्फूर्ति का अनुभव करता है तथा समाचार पत्रों के पृष्ठों पर आॅखें दौड़ाकर देश काल की घटनाओं, विचारों से वाकिफ होकर मानसिक रुप से वह अपने आप को तरोताजा अनुभव करता है। इस तरह समाचार पत्र आज की दुनिया में एक निहायत जरुरी चीज बन गया है।

 

समाचार पत्र में अग्रेजी न्यूज (छमूे) के छण्म्ण्ॅण्ैण् - ये चार अक्षर जुड़े हैं। जो क्रमशः उत्तर, पूर्व, पश्चिम  तथा दक्षिण के प्रतीक है। अर्थात समाचार पत्र वह है जिसमें चारों दिशाओं के समाचार होतेे हैं।

 

समाचार पत्र का जन्म ईटली के वेनिस नगर में 13 वीें शताब्दी में हुआ। इससे पूर्व लोगों में समाचार पत्र की परिकल्पना भी नहीं की। 17 वीं सदी में धीरे-धीरे अपनी उपयोगिता के कारण समाचार पत्र इंग्लैण्ड पहुॅचा। फिर धीरे-धीरे सारे ससार में फैला।

 

भारत में सर्वप्रथम कोलकाता में इसका जन्म और विकास हुआ। 19 जनवरी 1780 ई. को बंगाल गजटका कैलकटा जनरल एडवरटाईजर के प्रकाशन के साथ ही भारतीय  पत्रकारिता का जन्म हुआ। 1857 ई. से पूर्व उदन्त मार्तण्ड’ , ‘ःबंगदूत’, ‘प्रजामित्रआदि हिन्दी समाचार पत्रों का प्रकाशन हो चुका था। धीरे-धीरे वैज्ञानिक आविष्कार बढ़ते गए, मुद्रण यंत्रों के विकास के साथ ही समाचार पत्रों कका विकास होता गया।

 

मोबाईल क्रांति

वर्तमान युग में मोबाईल फोन जीवन की आवश्यकता बन गया है। बाल-वृद्ध सभी के पास मोबाईल फोन इिखाई देता है। यह समय की माॅग है, तभी सभी व्यक्तियों को इसने अपने घेरे में ले लिया है। यह आज कल सबके लिए सस्ता और उपयोगी बन गया है। आधुनिक जीवन में बिना मोबाईल के सभ्य जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। आज की सभ्यता का प्रथम चरण इस बेतार के यंत्र से ही प्रारम्भ होंता है। इसने संसार की दूरी को बहुत कम कर दिया है। बातचीत की सुविधा घर से जेब में पहॅुच गई है। घर-बाहर सभी समय यह इच्छित व्यक्ति से बात कराने मंे समर्थ है। चाहे कोई स्वजन चाहे देश में हो या विदेश में हर समय उससे मोबाईल के द्वारा सम्पर्क साधा जा सकता है। ये फोन विभिन्न प्रकार के माॅडल्स में उपलब्ध हैं इसमें अनेक क्रियाएॅ सम्पन्न हो जाती है। यह सूचना को टेप कर लेता है, सन्देश एस.एम. एस. के द्वारा भेज सकता है, फोन भेजने वाले का नम्बर बता सकता है। वह इस समय कहाॅ से बोल रहा है, यह जानकारी भी दे सकता है। फोटो खींच सकता है आदि। इतनी सारी क्रियाओं के सम्पादन के बदले हमें छोटी- सी कीमत देनी पड़ती है। मोबाईल कम्पनियांे की प्रतिस्पर्धा के चलते ये फोन बहुत सस्ते हो गए है और इनसे बात करान भी सस्ता हो गया है।

 

विज्ञापन अभियान

पैसे खर्च कर किसी वस्तु या विचार की पब्लिसीटी करना विज्ञापन कहा जाता हैै। आमतौर पर हम व्यापारिक या सामाजिक सुधार वाले विज्ञापन क्रम दर  क्रम देखने को मिलते हैं। यह उस रणनीति का हिस्सा होता है, जो  हम एक निश्चित उद्देश्य के लिए सुधारों के साथ प्रस्तुत करते हैं।  किसी भी विज्ञापन अभियान के सफल होने में मुख्य कारक ये होते है जो उसकी टारगेट और टारगेट ओडियेंस तक पहुॅचाने में महत्वपूर्ण रोल अदा करते हैं।

 

1.       प्लानिंग यानि रणनीति: इसमें बजट, टारगेट, टारगेट ओडियंेस, मार्केटिंग एरिया आदि का निर्धारण करते हैं।

 

2.       सिलेक्सन आॅफ मीडिया अर्थात माध्यम का चुनाव: हमें अपना विज्ञापन किस माध्यम के जरिये लोगों के बीच प्रस्तुत करें कि वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुॅचे और ज्यादा से ज्यादा प्रभावी हो। मसलन हमारा विज्ञापन पढ़ंे लिखे लोागों के लिए है तो हम टारगेट ओडियेंस के हिसाब से किसी ऐसे माध्यम जैसे टीवी, समाचार पत्र, इंटरनेट आदि जैसे माध्यम अपनाने की सोचेंगे, इसी तरह कम पढ़े लिखे लोगों के लिए रेडियो, टी.वी. जिसमें चित्रों के माध्यम से ज्यादा बताने की कोशिश की गई हो उसका चुनाव करेंगे।

 

3.       इपरोवमेंट यानि सुधार: इस प्रक्रिया में हम अपने विज्ञापन के सुधार पर जोर देंगे। यानि हमारा विज्ञापन कितने दिन और कितने समय और चलाया जाय या न चलाया जाय। अगर हम टारगेट ओडियेंस तक नहीं पहुॅच पा रहें हैं। तो क्या बदलाव या सुधार किया जाए कि हमे अपना टारगेट हासिल हो सके। माध्यम बदलना है या विज्ञापन में कुछ नया एड करना है आदि ऐसे कार्य विज्ञापन अभियान के इस चरण में पूरा किया जाता है।

 

4.       फीडबैक यानि प्रतिपुष्टि: फीडबैक किसी भी विज्ञापन अभियान का वह अंग हैं जिसमें यह पता लगाया जाता है कि हमारा विज्ञापन कितना प्रभावी रहा है। हम कितने लोगों तक पहुॅच पाएं हैं, क्या हमने जिस माध्यम का चुनाव किया था वो सही था या गलत। हम टारगेट आॅडियंश तक पहुंच पाए या नहीं। एक तरह से हम कह सकते हैं कि यह अभियान की वह कडी हैं जिसमें हमें एक तो भविष्य की राह निकल कर सामने मिलती हैं दूसरी हमारे द्वारा की गई मेहनत यह अभियान या कार्य का ग्राफ दिखाकर हमें आइना दिखाता है कि आप इसमें कितने सफल/असफल हुए हैं।

 

स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर जारी विज्ञापन 

जीवन के हर क्षेत्र में विज्ञापन कहीं न कहीं रुप से जुड़ा है, विज्ञापन अपने स्वरुप के अनुसार इच्छित ग्राहक वर्ग से जुड़े। इसके लिए किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं माध्यमों के जरिए विज्ञापनों को प्रचारित-प्रसारित किया जाता है। विज्ञापनकर्ता संदेशों को जनता या उपभोक्ताओं तक पहुॅचाने के लिए अनेकों माध्यमों का प्रयोग करता है।

 

निष्कर्ष:-

जानकारी देना व लेना मानवीय स्वभाव का विशेष अंग है, मनुष्य की जिज्ञासु प्रकुति उसें मिलों दूर घटना के विषय में जानने को बाध्य करती है। भारतीय युवा किसान समाचार पत्र एवं सूचना के ज्ञान-विज्ञान के उन्नति ने सूचना, संचार माध्यमों की एक नवीन श्रृंखला प्रस्तुत की। जिससे टीवी, फिल्म, इंटरनेट, फैक्स आदि महत्वपूर्ण भुमिका निभा रहे हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि मीडिया बाजार विज्ञापन और फिल्मी दुनिया समाचार पत्र के आइने में युवा भारतीय किसान अपना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वैश्वीकरण के दौर में प्रिन्ट व इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का महत्व युवाओं के लिए प्रतिदिन बढ़ रहा है। मीडिया लोक तंत्र के प्रहरी है और साथ ही साथ जनता तक अपनी आवाज पहुॅचाने के लिए सक्त माध्यम  भी है। हिन्दी भाषा धीरे-धीरे विज्ञापनी दुनिया और मीडिया के माध्यम से वैश्वीकृत रुप धारण कर रही है और अपने अंदाज में बाजार को लुभा रही है, पसंद आ रही है। आज किसी भी वस्तु, सेवा व विचार को आगे बढ़ानंे के लिए मीडिया बाजार, विज्ञापन, फिल्म, समाचार पत्र का सहारा लिया जाता है।

 

संदर्भ

1        गोयल, डाॅ. कंचन, मीडिया और अनुवाद, अनंग प्रकाशन, दिल्ली, पृ. न. 10 से 11-12  ।

2        एम. ई. विश्वनाथ अय्यर, अनुवाद कला पृ. 26

3        मौलिक विचार।

4        इंटरनेट संचार माध्यम।

 

Received on 15.03.2015

Revised on 16.04.2015

Accepted on 06.05.2015     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 6(2): April-June, 2015, 162-165